बुलिंग से लेकर अपराध सिनेमा तक: क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया में समाज, मानसिक स्वास्थ्य और न्याय पर गहन मंथन
सामाजिक प्रभावों पर केंद्रित “अनसीन वूंड्स: द रियल इम्पैक्ट ऑफ़ बुलइंग” सत्र में ज्योत्सना ब्रार, संगीता काइन, मानस लाल ने रिधिमा ओबेरॉय के साथ भावनात्मक आघात, डिजिटल उत्पीड़न और दीर्घकालिक मानसिक प्रभावों पर प्रकाश डाला। ज्योत्सना ब्रार ने विशेष रूप से छोटे बच्चों के मामले में सज़ा के बजाय सुधारात्मक सहयोग की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। संगीता काइन ने बुलिंग को एक प्रणालीगत विफलता बताया, जहाँ शिकायतों की अनदेखी और काउंसलिंग सुविधाओं की कमी स्पष्ट है। वहीं मानस लाल ने अपने पीड़ित होने के अनुभव साझा करते हुए संस्थानों से अपील की कि बच्चों को दंडित करने के बजाय संवेदनशीलता और समर्थन के साथ आगे बढ़ाया जाए।
सिनेमा और अपराध का संगम “बियॉन्ड वासेपुर: द इवॉल्विंग वौइस् ऑफ़ ज़ीशान क़ादरी” सत्र में देखने को मिला, जहां फिल्मकार ज़ीशान क़ादरी ने नितिन उपाध्याय के साथ चर्चा की। क़ादरी ने कहा कि अपराध कथाओं में अक्सर डार्क ह्यूमर का तत्व होता है और इसके उदाहरण के रूप में उन्होंने खोसला का घोसला जैसी क्राइम कॉमेडी फिल्मों का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्मों में अपराधियों को आमतौर पर बेहद तेज़ दिमाग वाला दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में वे ज़्यादा साहसी होते हैं और बुद्धि का कम इस्तेमाल करते हैं। आगे की योजनाओं पर बात करते हुए क़ादरी ने बताया कि वर्ष 2026 में वह भारत में लंबे समय से रह रहे अफ्रीकी मूल के एक समुदाय पर एक नॉन-फिक्शन किताब लिखने की योजना बना रहे हैं, जिसने विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से खेलों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन आज भी सामाजिक स्वीकार्यता और पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है।। बिग बॉस की अपनी यात्रा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वह 2025 में बिना किसी गेम प्लान के शो में गए थे और उन्हें सह-प्रतिभागियों और दर्शकों से जो सम्मान, अपनापन और प्यार मिला, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
शाम के सत्रों की शुरुआत “फिक्शन ऐज़ हिस्ट्री: बोस वर्सेज नेहरू” से हुई, जिसमें पत्रकार अंशुल चतुर्वेदी ने आलोक लाल के साथ संवाद किया। प्राइम-टाइम सत्र “बिहाइंड द बैज: स्टोरीज़ बिल्ट फॉर द बिग स्क्रीन” में अभिनेत्री त्रिधा चौधरी—जो ‘आश्रम’ और ‘बंदिश बैंडिट्स’ जैसे लोकप्रिय शोज़ के लिए जानी जाती हैं—और के.के. गौतम ने सतीश शर्मा के साथ वास्तविक अपराध और पुलिसिंग कहानियों को सिनेमा एवं ओटीटी के लिए रूपांतरित करने पर विचार साझा किए।
आस्था, धोखाधड़ी और विश्वास प्रणालियों पर केंद्रित सत्र “गोल्ड, गॉड एंड गुरूज़: द सिनिस्टर कल्ट ऑफ़ फेथ एंड फ्रॉड” में उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार और अभिनेत्री त्रिधा चौधरी ने गौरव द्विवेदी के साथ संवाद किया। सत्र के दौरान बोलते हुए अशोक कुमार ने कहा कि देशभर में कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने कुछ आश्रमों की आड़ में संचालित हो रही विभिन्न प्रकार की आपराधिक गतिविधियों का पर्दाफाश किया है और उनका दस्तावेज़ीकरण किया है, जिनमें वित्तीय शोषण और अनुयायियों के साथ दुर्व्यवहार भी शामिल हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी आश्रम या आध्यात्मिक संस्थान धोखाधड़ी में संलिप्त हैं, बल्कि वास्तविक आस्था और संगठित छल-कपट के बीच स्पष्ट अंतर करना अत्यंत आवश्यक है।
कार्यक्रम के समापन पर विचार व्यक्त करते हुए अशोक कुमार ने क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया के सफल आयोजन की सराहना की और कहा कि इस मंच ने अपराध, विश्वास प्रणालियों और जन-विश्वास जैसे विषयों पर सार्थक संवाद को संभव बनाया। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिसिंग, साहित्य, सिनेमा और पत्रकारिता से जुड़े विविध स्वरों को एक साथ लाकर यह उत्सव किशोर न्याय, साइबर अपराध, नशा तस्करी, भूमि घोटालों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जन-जागरूकता बढ़ाने में सफल रहा।
द डिटेक्टिव्स डेन में समानांतर सत्रों के अंतर्गत साहित्यिक और विषयगत चर्चाएं हुईं, जिनमें “व्हाट ड्रॉस अस टू राइट अबाउट मर्डर: ए कन्वर्सेशन अक्रॉस लैंग्वेजेज” सत्र में अंजलि कौर सुंदराज और गोपाल शुक्ला ने बातचीत करी। दस वर्षों से अधिक के अपराध रिपोर्टिंग अनुभव का हवाला देते हुए गोपाल शुक्ला ने कहा कि उनकी पुस्तक भले ही फिक्शन की भाषा में लिखी गई हो, लेकिन उसके पात्र और घटनाएं वास्तविक जीवन से प्रेरित हैं।
इसके बाद “लव एंड क्राइम: ए डीप डाइव इंटू लव, लस्ट, जेलेसी एंड मर्डर” सत्र में रूबी गुप्ता और अश्विनी भटनागर ने वार्तालाप करा, जिसके बाद “द चैलेंजेज़ इन एडिटिंग क्राइम राइटिंग” सत्र आयोजित हुआ, जिसमें पेंग्विन की संपादक सृष्ट्री सेठी ने संजीव मिश्रा के साथ कहा कि अपराध लेखन को सशक्त नैतिक आधार पर खड़ा होना चाहिए और लेखक की हर पंक्ति जवाबदेह होनी चाहिए।
सच्चे अपराध यथार्थ पर केंद्रित “नार्को रियलिटीज़: ट्रू क्राइम स्टोरीज़ बिहाइंड द हेडलाइंस” सत्र में राम सिंह मीणा और राजेश मोहन ने मीनाक्षी के साथ चर्चा की। मीणा ने बताया कि मादक पदार्थ अक्सर अफीम और भांग जैसे प्राकृतिक स्रोतों से शुरू होते हैं, लेकिन प्रवर्तन एजेंसियां प्रायः छोटे विक्रेताओं और नशेड़ियों को पकड़ पाती हैं, जबकि मुख्य आपूर्ति तंत्र छिपा रह जाता है। इसके बाद “मैट्रिमोनियल क्राइम्स फ्रॉम द आईज़ ऑफ़ ए प्राइवेट डिटेक्टिव” सत्र में देव गोस्वामी और रूबी गुप्ता ने बातचीत करी, वहीँ “द ओथ ऑफ़ शकुनि: महाभारत एस ए क्राइम एपिक” सत्र में सपन सक्सेना, हैरी पेंटल और सुहैल माथुर ने विनय कंचन के साथ वार्तालाब किया। इन सत्रों में अपराध, प्रतिशोध और नैतिक द्वंद्व को पौराणिक दृष्टि से देखा गया।
फेस्ट के समापन पर फेस्टिवल चेयरमैन एवं उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार, फेस्टिवल डायरेक्टर एवं पूर्व डीजी उत्तराखंड आलोक लाल, फेस्टिवल सेक्रेटरी रणधीर के अरोड़ा और डीसीएलएस के मुख्य समन्वयक प्रवीन चंडोक ने क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया को अपराध, न्याय और समाज पर राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण संवाद मंच के रूप में और सुदृढ़ करने की प्रतिबद्धता दोहराई।
